मराठी अध्ययन केंद्रों के फैसले पर उठे सवाल: राजस्थानी भाषा के सम्मान को लेकर विधायक रविन्द्र सिंह भाटी ने सरकार से मांगा जवाब
जयपुर/बाड़मेर। राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा के अध्ययन केंद्र स्थापित करने के निर्णय के बाद प्रदेश की मातृभाषा राजस्थानी को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। शिव विधायक रविन्द्र सिंह भाटी ने इस मुद्दे पर प्रदेश सरकार से सवाल करते हुए कहा कि सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन अपनी मातृभाषा की उपेक्षा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती।सोशल मीडिया पर जारी अपने विस्तृत वक्तव्य में भाटी ने स्पष्ट किया कि उन्हें मराठी सहित देश की किसी भी भाषा के अध्ययन या संवर्धन से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की सभी भाषाएँ देश की साझा सांस्कृतिक धरोहर हैं और युवाओं को बहुभाषी बनने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन उन्होंने प्रश्न उठाया कि जिस राजस्थान की अपनी समृद्ध भाषाई विरासत है, उसी प्रदेश में राजस्थानी भाषा आज भी अपेक्षित सरकारी सम्मान और संस्थागत पहचान से वंचित क्यों है।
भाटी ने कहा कि राजस्थानी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि राजस्थान की संस्कृति, इतिहास, लोक परंपराओं और अस्मिता की पहचान है। डिंगल, पिंगल, लोकगाथाओं और समृद्ध साहित्यिक परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिस भाषा में प्रदेश की सांस्कृतिक चेतना जीवित है, उसे अब तक उसका अधिकार नहीं मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि विश्वविद्यालयों में मराठी अध्ययन केंद्र स्थापित करने के निर्देश दिए जा सकते हैं, तो प्रदेश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के समुचित विभाग स्थापित करने की दिशा में अब तक प्रभावी पहल क्यों नहीं हुई।
विधायक भाटी ने बताया कि उन्होंने पिछले विधानसभा सत्र में संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत राजस्थानी भाषा को राजस्थान की राजभाषा का दर्जा दिए जाने के उद्देश्य से एक प्राइवेट मेम्बर बिल प्रस्तुत किया था। उनके अनुसार यह विधेयक पिछले छह महीनों से लीगल सेल में लंबित है और उस पर कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं दे रही है।
उन्होंने कहा कि जब अपनी भाषा के सम्मान की बात आती है तो प्रक्रियाओं और नियमों का हवाला दिया जाता है, जबकि अन्य विषयों पर निर्णय अपेक्षाकृत तेजी से लिए जाते हैं। ऐसे में प्रदेश की जनता सरकार की मंशा पर सवाल उठाने को विवश है।अपने वक्तव्य के अंत में भाटी ने दोहराया कि उनका उद्देश्य किसी भी भारतीय भाषा का विरोध करना नहीं, बल्कि राजस्थानी भाषा को उसका उचित सम्मान दिलाना है। उन्होंने सरकार से मांग की कि राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए प्रभावी पहल की जाए, विश्वविद्यालयों में इसके विभाग स्थापित किए जाएँ तथा नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा के अध्ययन और संरक्षण का अवसर उपलब्ध कराया जाए।
भाटी ने कहा कि राजस्थानी भाषा का प्रश्न केवल भाषाई नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक अस्मिता और पहचान से जुड़ा विषय है, जिस पर अब सरकार को स्पष्ट और ठोस निर्णय लेना चाहिए।


