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विदेशी फंडिंग पर सरकार की सख्ती, NGO के लिए बदले नियम

विदेशी फंडिंग पर सरकार की सख्ती, NGO के लिए बदले नियम

विदेशी फंडिंग पर सरकार ने बढ़ाई सख्ती, NGO के लिए नए नियम लागू भारत सरकार ने विदेशी फंडिंग को लेकर निगरानी और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है।

गृह मंत्रालय (MHA) ने 23 जून को विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) से जुड़े नियमों में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं।

इन बदलावों का उद्देश्य विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों की गतिविधियों पर अधिक पारदर्शिता और नियंत्रण सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।

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FCRA में क्या-क्या बदला?

नए नियमों के तहत विदेशी फंड प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के लिए कुछ शर्तें और सख्त कर दी गई हैं।

नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई और दंड के प्रावधानों को भी मजबूत किया गया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक 21,933 NGO के FCRA लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं।

यह संख्या बताती है कि सरकार लंबे समय से इस क्षेत्र में निगरानी बढ़ा रही है।

विदेशी फंड खर्च करने की नई शर्तनए प्रावधानों के अनुसार यदि कोई संगठन दो वर्षों के भीतर कम से कम 10 लाख रुपये का विदेशी फंड निर्धारित उद्देश्यों पर खर्च नहीं करता है, तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सकता है।

इसका उद्देश्य निष्क्रिय या केवल कागजी रूप से संचालित संस्थाओं की पहचान करना माना जा रहा है।

धर्म परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों पर स्पष्टता संशोधित नियमों में धर्म परिवर्तन से संबंधित गतिविधियों को योग्य उद्देश्यों की सूची से बाहर रखा गया है।

सरकार का कहना है कि विदेशी फंड का उपयोग केवल अनुमत और घोषित सामाजिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य या विकास संबंधी कार्यों के लिए ही किया जाना चाहिए।

विदेशी नागरिकों की भूमिका पर भी असर नियमों के अनुसार विदेशी नागरिकों को किसी संगठन में प्रमुख पदाधिकारी के रूप में नियुक्त करने को लेकर भी सख्त दृष्टिकोण अपनाया गया है।

ऐसे मामलों की अब अधिक गहन जांच की जा सकती है।

क्या होगा इन बदलावों का प्रभाव?

विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियमों से विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों की जवाबदेही बढ़ेगी।

वहीं कुछ सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार समूहों का कहना है कि अत्यधिक नियमन से वैध सामाजिक कार्यों पर भी असर पड़ सकता है।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन नियमों का जमीनी स्तर पर क्या प्रभाव पड़ता है और विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता तथा सामाजिक गतिविधियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है।

बड़ा सवाल क्या विदेशी फंडिंग से जुड़े प्रत्येक ट्रांजैक्शन, डोनर और खर्च का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए, या फिर मौजूदा नियामक व्यवस्था और लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया ही पर्याप्त है? इस पर बहस जारी है।

Swarup Soni
Swarup Sonihttps://www.thartaknews.com
मैं स्वरूप सोनी Thar Tak News का Editor हु। मैं राजस्थान सहित देश-दुनिया की ताजा खबरें, स्थानीय समाचार, राजनीति, सामाजिक मुद्दे और महत्वपूर्ण घटनाओं को पाठकों तक सही और तेज़ जानकारी के साथ पहुंचाने का कार्य करता हु। Thar Tak News का उद्देश्य विश्वसनीय और निष्पक्ष समाचार प्रदान करना है।
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