Pokaran Hospital Controversy: Adhoc Staff Holding DDO Power, ₹2 Crore Medicine Purchase Under Scanner

Pokaran Hospital DDO Scam: UTB Staff Under Scanner 05

Pokaran Hospital DDO Scam: UTB Staff Under Scanner

Pokaran Hospital Controversy: Adhoc Staff Holding DDO Power, ₹2 Crore Medicine Purchase Under Scanner

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जैसलमेर जिले के पोकरण उप जिला अस्पताल में इन दिनों एक बड़ा प्रशासनिक और वित्तीय विवाद सामने आया है, जिसने स्थानीय लोगों के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला एक UTB (अस्थायी/एडहॉक) कार्मिक, अनिल गुप्ता, से जुड़ा हुआ है, जो पिछले करीब दो वर्षों से अस्पताल के PMO (प्रमुख चिकित्सा अधिकारी) की कुर्सी संभाल रहे हैं।

नियमों के अनुसार, PMO पद के साथ DDO (Drawing and Disbursing Officer) का अधिकार भी जुड़ा होता है, जिसके तहत सरकारी धन का प्रबंधन, भुगतान और व्यय की स्वीकृति शामिल होती है।

लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक अस्थायी UTB कार्मिक को इतना महत्वपूर्ण और संवेदनशील वित्तीय अधिकार कैसे दिया गया।

सरकारी नियमों के मुताबिक, DDO का पद आमतौर पर स्थायी और वरिष्ठ अधिकारियों को ही दिया जाता है, जिनके पास प्रशासनिक अनुभव और जवाबदेही तय होती है।

लेकिन पोकरण अस्पताल में इस व्यवस्था को दरकिनार करते हुए एक अस्थायी कर्मचारी को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर सवाल उठ रहे हैं।

अस्पताल में मौजूद कई वरिष्ठ और स्थायी डॉक्टर इस पद के लिए पात्र माने जाते हैं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर UTB कार्मिक को यह जिम्मेदारी देना कई स्तरों पर जांच का विषय बन गया है।

2 करोड़ की दवा खरीद पर संदेहसूत्रों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में DDO पावर का उपयोग करते हुए दवाई खरीद के नाम पर 2 करोड़ रुपये से अधिक की राशि निकाली गई है।

यह मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि राज्य सरकार द्वारा अधिकांश आवश्यक दवाइयां पहले से ही मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी राशि किस आधार पर खर्च की गई और क्या इन खरीद प्रक्रियाओं में नियमों का पालन किया गया या नहीं।

यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो यह एक बड़ा वित्तीय घोटाला साबित हो सकता है।

प्रशासनिक जिम्मेदारी पर सवालइस पूरे मामले में यह भी जांच का विषय है कि आखिर किस अधिकारी या स्तर से अनिल गुप्ता को PMO की कुर्सी पर बैठाने की अनुशंसा की गई।

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोरों पर है कि क्या इस व्यवस्था के पीछे किसी प्रकार का आर्थिक लेन-देन या दबाव काम कर रहा है।

हालांकि, इन आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सवाल लगातार उठ रहे हैं।

जनता में बढ़ता आक्रोश पोकरण क्षेत्र की जनता अब इस मामले में पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है।

लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील सेवा में इस प्रकार की अनियमितताएं न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग हैं, बल्कि मरीजों के अधिकारों के साथ भी खिलवाड़ है।

स्थानीय सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है, ताकि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सके।

अब सबकी नजर स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हुई है।

यदि इस मामले में निष्पक्ष जांच होती है, तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।

साथ ही, यह भी स्पष्ट हो पाएगा कि क्या वास्तव में नियमों की अनदेखी हुई है या फिर यह केवल प्रशासनिक चूक का मामला है।

पोकरण अस्पताल का यह मामला न केवल एक व्यक्ति या एक पद तक सीमित है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।

अब जरूरी है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और सच्चाई जनता के सामने लाई जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।