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राजकीय चिकित्सक बाड़मेर की हकीकत..04

पत्रकार की पीड़ा

राजकीय चिकित्सक बाड़मेर की हकीकत

राजकीय चिकित्सक बाड़मेर की हकीकत

राजकीय चिकित्सालय बाड़मेर की हकीकत — सिस्टम की नाकामी या ईगो की राजनीति बाड़मेर।

जब एक पत्रकार की बेटी को समय पर डॉक्टर नहीं मिलता और उसे गंभीर हालत में जोधपुर रेफर करना पड़ता है, तो सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं रहता बल्कि पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा हो जाता है।

निहारिका टाइम्स के संपादक सबल सिंह भाटी ने गंभीर आरोप लगाया है कि.“वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी और शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. महेन्द्र चौधरी अगर जिला कलेक्टर के ‘ईगो’ की भेंट नहीं चढ़ते और जेल में ड्यूटी पर नहीं लगाए जाते, तो आज मेरी बच्ची वेंटिलेटर पर नहीं होती।

”बताया जा रहा है कि बाड़मेर के राजकीय चिकित्सालय में समय पर शिशु रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं थे।

हालत बिगड़ने पर बच्ची को जोधपुर रेफर किया गया, जहां उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा।

सबसे बड़ा सवालजेल में शिशु रोग विशेषज्ञ की ड्यूटी क्यों?क्या जिला अस्पताल में बच्चों की जान से ज्यादा जरूरी प्रशासनिक आदेश हैं?

अगर एक पत्रकार को समय पर इलाज नहीं मिला, तो आम आदमी किस उम्मीद पर जिए?

सिस्टम बनाम संवेदनशीलताअगर आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं —यह प्रशासनिक अहंकार और स्वास्थ्य तंत्र की प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल है। बाड़मेर जैसा सीमावर्ती जिला पहले ही विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है।

ऐसे में उपलब्ध विशेषज्ञ को गैर-जरूरी ड्यूटी में लगाना क्या स्वास्थ्य सेवाओं के साथ खिलवाड़ नहीं?

🔎 प्रशासन से मांगपूरे मामले की निष्पक्ष जांच होडॉक्टरों की ड्यूटी आवंटन नीति सार्वजनिक हो जिला अस्पताल में 24×7 शिशु रोग विशेषज्ञ की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए

✍️ कड़वा सच अगर सिस्टम की जिद और ईगो के कारण मासूम जिंदगी वेंटिलेटर तक पहुंच रही है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं — यह व्यवस्था की विफलता है।

आज सवाल सबल सिंह भाटी की बेटी का है,कल किसी किसान, मजदूर या आम नागरिक के बच्चे का हो सकता है।बाड़मेर को जवाब चाहिए।

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